बुधवार, 6 जनवरी 2016

जीत के प्रति प्रीत



हार के उस पार का संसार मेरा
जीत के प्रति प्रीत सा व्यवहार मेरा
दो अगर तुम संगिनी बन साथ मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा  
हो कभी जब मेरे मन का दृश्य खाली
लौ जला कर मन में करदे तू दिवाली
अपने सपनो को तू दे आकार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा  
मेरे मन के द्वार को तुम आज खोलो
मन को मेरे भी आज तुम टटोलो
कर दो अपने कंठ से उदगार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा  
होता होगा तेरे मन में भी उजाला
जलती होगी तेरे भी मन प्रेम ज्वाला
कर दो मन के तम का तुम उपचार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा   
स्वप्न तेरे देखता हूँ इन नयन में
चाहता हूँ तुमको पाना इस भू गगन में
स्वप्न अब तू आज कर साकार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा   
मैं तो तुमको अपनी संगी मानता हूँ
भाग्य के अनुबंध को मैं जनता हूँ
सौंप दो अब अपना मन आदिकार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा   
 देखते हो अब वो सपने तुम नयन में
है छुपी एक तृष्णा इस भोले पन में
नयनो का ये भोलापन आधार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा   
क्यों तुम्हारे मन का कौन रिक्त सा ये
क्यों रगों का रक्त है विरक्त सा ये
अपने मन में करदो तुम संचार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार मेरा   


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