हार के उस पार का संसार
मेरा
जीत के प्रति प्रीत सा
व्यवहार मेरा
दो अगर तुम संगिनी बन साथ
मेरा
जीत के प्रति प्रीत का
संसार मेरा १
हो कभी जब मेरे मन का
दृश्य खाली
लौ जला कर मन में करदे तू
दिवाली
अपने सपनो को तू दे आकार
मेरा
जीत के प्रति प्रीत का संसार
मेरा २
मेरे मन के द्वार को तुम आज खोलो
मन को मेरे भी आज तुम टटोलो
कर दो अपने कंठ से उदगार
मेरा
जीत के प्रति प्रीत का
संसार मेरा ३
होता होगा तेरे मन में भी
उजाला
जलती होगी तेरे भी मन
प्रेम ज्वाला
कर दो मन के तम का तुम
उपचार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का
संसार मेरा ४
स्वप्न तेरे देखता हूँ इन
नयन में
चाहता हूँ तुमको पाना इस भू गगन
में
स्वप्न अब तू आज कर साकार
मेरा
जीत के प्रति प्रीत का
संसार मेरा ५
मैं तो तुमको अपनी संगी
मानता हूँ
भाग्य के अनुबंध को मैं
जनता हूँ
सौंप दो अब अपना मन
आदिकार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का
संसार मेरा ६
देखते हो अब वो सपने तुम नयन में
है छुपी एक तृष्णा इस
भोले पन में
नयनो का ये भोलापन आधार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का
संसार मेरा ७
क्यों तुम्हारे मन का कौन
रिक्त सा ये
क्यों रगों का रक्त है
विरक्त सा ये
अपने मन में करदो तुम
संचार मेरा
जीत के प्रति प्रीत का
संसार मेरा ८
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