लॉक डाउन के इस काल में लोग अब धीरे धीरे रमने लग गए है | ये समाजवाद की परिभाषा को परिभाषित करने का काल है | परिभाषित करने का अर्थ समाजवाद को सही ठहराना नहीं है अपितु इससे भयभीत होने से है | क्यों की जिस प्रकार वर्त्तमान स्थति में लोग ढल रहे है उससे ये लगता है की समाज इसके बाद की स्थति की कल्पना नहीं करना चाहते | भविष्य की कल्पना और दूरदर्शिता में ज्यादा अंतर नहीं है |लेकिन इसे केवल भविष्य की कल्पना मात्र माने तो भी हमें तैयार रहना चाहिए उस परिस्थिति से जिसे हम समाजवाद के परिणाम के नाम से परिभाषित करेंगे |
समाजवाद का परिणाम केवल गरीबी ही है | चूँकि ये दूरगामी परिणाम है लेकिन सबको ये भी पता होना चाहिए की अंतिम परिणाम सबसे दूर ही होता है | इसलिए दूरगामी परिणाम को सदैव गंभीरता से लेना चाहिए | परिणाम की बात करे तो लॉक डाउन के बाद देश को गरीबी , बेरोजगारी , आर्थिक संकट जैसी परिस्थितियों को झेलना पद सकता है |
समस्या को टाला नही जा सकता लेकिन उससे लड़ा जा सकता है | कोरोनो काल में जितना जरुरी लॉक डाउन है उससे कही ज्यादा लॉक डाउन का पालन करना है | क्यों की जब तब इसकी पलना नहीं होगी तब तक लॉक डाउन सफल नहीं होगा और जब तक लॉक डाउन सफल नहीं होगा तब तक इसे हटाना संभव भी नहीं | यहाँ एक बात समझने की है की जितना लॉक डाउन लम्बा होगा उसके परिणाम उतने ही भयावह होंगे | इसलिए लॉक डाउन की पलना बहुत जरुरी है |
जिस प्रकार लॉक डाउन एक सत्य है उसी प्रकार उसके परिणाम भी एक सत्य है | इसलिए इसके परिणाम के लिए भी हमें मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार रहना चाहिए |